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काश हर दिन हो गौ-पूजा, आवारा घूम रही गाय उठा रही गोपाष्टमी पर्व की आस्था पर सवाल

गाय cow

सतनाली:  शुक्रवार 16 नवंबर को गोपाष्टमी पर्व पूरे देश में हर्षोल्लास से मनाया जाएगा तथा गोसेवा के साथ-साथ गौमाता के संरक्षण का संकल्प लेकर गोवंश बचाने का प्रण भी लिया जाएगा। वर्ष में यहीं एक दिन होता है जब तथाकथित राजनेताओं व समाजसेवियों द्वारा गोसेवा का दंभ भरा जाता है तथा बड़े बड़े दावे किए जाते है परंतु इस पर्व के बाद गोभक्त होने का दावा करने वाले राजनीतिक नेताओं व समाजसेववियों द्वारा गोवंश की सुध तक नहीं ली जाती। यहीं कारण है कि वर्तमान में जिलें की गौशालाओं की दशा अत्यंत दयनीय है तथा किसी से छिपी हुई नहीं है।

गोपाष्टमी पर्व पर हर कस्बे, गांव व शहरों में विभिन्न प्रकार के धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन तो किया जाता है तथा गोसेवा व संरक्षण के लिए प्रयास व कदम उठाने के दावे भी प्रशासन, समाजसेवी संस्थाओं व राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा किए जाते है लेकिन इसके बावजूद भी आज गोवंश अपने अस्तित्व व समाज में प्राप्त माता के दर्जे को हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहा है।

शुक्रवार को देशभर में गोपाष्टमी पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा तथा जगह-जगह कार्यक्रमों  का आयोजन कर गोसेवा का संकल्प लिया जाएगा। विचारणीय बात यह है कि वर्ष में केवल इसी एक दिन गौ माता के सम्मान में ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन कर शेष वर्ष में 364 दिन गौमाता की अनदेखी क्यों की जाती है। इस बात का जीता-जागता उदाहरण वर्षभर विभिन्न कस्बों की गलियों में आवारा घूमती असंख्य ऐसी गाय है जो केवल इस दिन अपनी पूजा की नहीं बल्कि अपनी स्थायी निवास की प्रतीक्षा कर रही है।

कस्बा व आस पास के गांवों में आज के दिन जगह-जगह गौमाता के सम्मान

हैरत की बात यह है कि कस्बाभर में आवारा घूम रही ऐसी असंख्य गायों के उद्वार के लिए न तो सामाजिक संस्थाए कोई विशेष कदम उठा रही है और न ही क्षेत्र की गौशालाएं। यहीं वजह है कि गोपाष्टमी के दिन भी क्षेत्र में असंख्य गौमाताएं गंदगी के ढ़ेरों में अपना भोजन तलाशती करती हुई दिखाई दे जाएगी। कस्बा व आस पास के गांवों में आज के दिन जगह-जगह गौमाता के सम्मान में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं वहीं शेष 364 दिन गौमाता की बेकद्री होती है।

कस्बा की हर गली, नुक्कड में आवारा घूमती इन गंदगी में मुंह मारती गौमाताएं इसका जीता-जागता उदाहरण है। इस समय सतनाली क्षेत्र के गांवों में करीब आधा दर्जन गौशालाएं संचालित की जा रही है। समाजसेवा के नाम पर ये सभी गौशालाएं गोसेवा के लिए कार्य कर रही है।

गौ माता के विकास पर खर्च की जाने वाली राशि का इस्तेमाल अन्य कार्यक्रमों पर कर दिया जाता है

लेकिन हकीकत यह है कि इन गौशालाओं में समय-समय पर गोसेवा के नाम पर कार्यक्रमों का आयोजन कर चंदा एकत्रित तो कर लिया जाता है। लेकिन आवारा घूमने वाली गऊओं को जब गौशाला में संरक्षण की बात आती है तो इनमें स्थान की कमी होने का हवाला देकर गऊओं को संरक्षण देने से इंकार तक कर दिया जाता है। मात्र गौपाष्टमी के पर्व पर गौशालाओं में गौमाताओं पर हार चढ़ाकर व उन्हें चारा, मिठाई इत्यादि खिलाकर औपचारिकता पूरी कर दी जाती है। हैरत की बात ये है कि इस दिन कई संस्थाओं द्वारा गौ माता के विकास पर खर्च की जाने वाली राशि का इस्तेमाल अन्य कार्यक्रमों पर कर दिया जाता है।

यदि इस राशि का सही ढंग से प्रयोग किया जाए तो उससे कस्बा व आसपास के गांवों में आवारा घूम रही असंख्य गौमाताओं का भला किया जा सकता है। इस बात में कोई शक नहीं कि कस्बा के आसपास में गौशालाएं चल रही है। वे नि:संदेह गौमाताओं के पालन पोषण का कार्य कर रही है, परंतु बात केवल इन गौशालाओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि बात उन गौमाताओं की है जो आज अपने लिए रैन बसेरा खोज रही है, उन्हें आज भी राह चलते लोगों की बदसलूकी का सामना करना पड़ रहा है।

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