जिस तरह विलुप्त हो रही है गौरैया क्या उसी तरह गुम हो जाएगा डाकिया एक दिन चिट्ठियां

इन दिनों मेरे घर डाकिया नहीं आता

जबकि पहले रोज आता था और18_04_2017-chithiyan

लाता था खूब सारी चिट्ठियां

जादुई झोले में भरकर

मैं अब सोचना नहीं चाहता हूं कि

आखिर उसका क्या हुआ होगा

फिर भी याद आता है वह

आंगन में रोज फुदकने वाली गौरैया की तरह

जिस तरह विलुप्त हो रही है गौरैया

क्या उसी तरह गुम हो जाएगा डाकिया एक दिन

जिसके आने भर से चेहरे पर चमक आ जाती थी

वह भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएगा!

 

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